शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

रसमे -जनाज़ा तो है..!!!

कमलेश वर्मा
हम कब के मरगये थे तेरे प्यार मे ,
अदायगी
रसमे -जनाज़ा तो है ज़माने की,

पता चल गया होता बहुत पहले,
पर
तूने कसम दी थी ना बताने की ,,

बन गयी थी जिंदगी एक बेजान बुत जब हमने ,
आहट
सुनी थी किसे बेगाने की,,

जिंदगी
हो गयी थी मौत पर भारी ,
जब
आया था वक़्त ,प्यार मे मिट जाने की,,

जिंदगी देख कर मरी फिर एक बार ,
जब तेरी बेताबी दिखी परायी बाहों मे सिमट जाने की ,,

'
कमलेश' मैने खुद ही मूंद ली आँखें , क्यूँ की ,
तुमने कर दी थी तैयारी मेरे मर जाने की,,

2 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

behtreen parastuti...

Sonal Rastogi ने कहा…

क्या कहें !
मन को छूने वाली रचना