शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

रोहित "मीत "(ऑरकुट पर किसी के स्क्रैप से )

अश्को से लबो की प्यास बुझती है ,
माजी की चोट से रग-२ दुखती है ।

कोंन कहता है मोहबत नहीं मिलती ,
सोने-चाँदी के बदले सरे-बाज़ार बिकती है ।

कभी उस आँगन से था रहगुजर अपना,
मगर वहां आज दीवार सी दिखती है।

भूखे-नंगे और फुटपाथ पे ठिठुरते लोग,
वक़्त भी कैसे-२ "मीत" किरदार बदलती है॥

2 टिप्‍पणियां:

अल्पना वर्मा ने कहा…

bahut achchee ghazal hai.
कभी उस आँगन से था रहगुजर अपना,
मगर वहां आज दीवार सी दिखती है।

yah sher khaas lagaa.
abhaar

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

वाह लाजवाब गजल. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.