सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

चाणक्य शर्मा की ओजश्वी रचना ...!!!

बस नारों में गाते रहिए कि कश्मीर हमारा है, छूकर तो देखो हर हिम चोटी के नीचे इक अंगारा है।।
दिल्ली अपना चेहरा देखे धूल उठाकर दर्पण की, दरबारों की तस्वीरे है बस बेशर्म समर्पण की।।
काश्मीर है जहां तमंचे है केसर की क्यारी में, काश्मीर है जहां रूदन है बच्चों की किलकारी में।।
काश्मीर है जहां तिरंगे झण्डे फाड़े जाते है, 47 के बटंवारे के घाव उघाड़े जाते है।।
काश्मीर है जहां हौंसलों के दिल तोड़े जाते है, खुदगर्जी में जेलों से हत्यारे छोड़े जाते है।।
काश्मीर है जहां विदेशी समीकरण गहराते है, गैरों के झण्डे भारत की भूमि पर लहराते है।।
काश्मीर है जहां दरिंदों की मनमानी चलती है, घर-घर में एके 56 की राम कहानी चलती है।।
काश्मीर है जहां हमारा राष्ट्रगान शर्मिन्दा है, भारत मां को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है।।
काश्मीर है जहां देश शीश झुकाया जाता है, दरिंदों गद्दारों को खाना भिजवाया जाता है।।
हमकों दो आंसू नहीं आते है, बहुत बड़ी दुर्घटना पर, थोड़ी सी चर्चा होती है बहुत बड़ी घटना पर।।
राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाति पर, भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर।।
मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर, भारत के बेटे शरणार्थी हो गए अपनी धरती पर।।
वे घाटी से खेल रहे है गैरों के बलबूते पर, जिनकी नाक टिकी है पाकिस्तानी जूतों पर।।
फिर भी खून सने हाथों को न्यौता है दरबारो का, जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अधिंयारों का।।
कुर्सी भूखी है नोटों के थैलों की, कुलवन्ती दासी हो गई आज रखैलों की।।
घाटी आंगन हो गई खूनी खेलों की, आज जरूरत है सरदार पटेलों की।।

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