शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

मेरा तन- मन


मेरा तन- मन उचाट क्यूँ है? इस पूरे जहान से ,
चिड़ियों ने भी समेट लिये , घोंसले मेरे मकान से ।!

इंसानों में खुदगर्जी हो गयी ,इस कदर हावी ,
जड़ भी कहने लगे ,हम अच्छे है इस इन्सान से ।!

फिजां की इन सरसराती हवावों में है ,बू साजिश की
,
इनकी दोस्ती से है कहीं अच्छी ,दुश्मनी तूफ़ान से
।!

कितना भी अफ़सोस कर लो, इस जमाने नीयत पर ,
कितने बेगुनाहों को गुजारा है ,इसने अपने इम्तिहान से ।!

'
कमलेश 'अब भी बहुत कुछ है यहाँ, बाकी कहने को ,
पहले अपनी धरती संवारो ,फिर शिकवा करो आसमान से ।!!

3 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

PRATUL ने कहा…

संजय जी,
एक बहुत ही अच्छी रचना, बहुत संवेदना भरी, काफिया लाजवाब

PRATUL ने कहा…

shaayad ek-aad jagah spelling mistake hai. yadi hain to sudhaar len. jaise ki -- 'is jamaane "kii" niyat par' - me.