बुधवार, 21 अप्रैल 2010

इक नाम तेरा ..बस कुछ और नही ...!!!

  • भाव विह्वल सजल नैनो में, अवसाद भरा ,
  • कांपती है आत्मा थर्राती है नभ-धरा
  • कैसी अनहोनी घटित हुई ,है जीवन में ,
  • मात्र पात के स्पंदन से भी है ,ये!मन डरा ,
  • सदियों की बातें करता रहा मै सदा ,
  • सब कुछ विलुप्त हो गया ,
  • बस पलक झपकी थी जरा ,
  • क्यों नहीं भाता कोई आश्वासन मन को ,
  • अब सम्वेदना का स्वर भी लगता है खुरदरा ,
  • काश !पढ़ पाते उस के लिप्यांतर को कभी ,
  • तो आज होता इतना खुद का मन भरा ,
  • अब भी वक्त है सोच ले ये नादाँ ''कमलेश ''
  • बस नाम का करले ...सौदा इकदम खरा-खरा

4 टिप्‍पणियां:

मेरे भाव ने कहा…

kash............man bhara
bahut hi bhavpurn rachna hai..... badhai......

JHAROKHA ने कहा…

Bahut sundar bhavanaon aur samvedanaon se bharpoora rachana----.

dipayan ने कहा…

काश !पढ़ पाते उस के लिप्यांतर को कभी ,
तो आज न होता इतना खुद का मन भरा ,

dil ki gahrayee se nikle ye bhav dil ko choo jate hai. bahut khoob..

संजय भास्कर ने कहा…

फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई