मंगलवार, 18 मई 2010

इन आँखों का क्या गुनाह था ,..!


इन आँखों का क्या गुनाह था ,

सिर्फ़ नज़र ही तो मिलाया था ,

कसूर तो उस वक्त का था ,

जिसने दो दिलो को मिलाया था ,

जब मिली दोनों की आँखे तो ,

इस दिल ने भी मोहाब्बत का चिराग जलाया था ,

आँखों ने इशारा ही तो किया था ,

फिर क्यों इस दिल ने हलचल मचाया था ,

आँखों ने देखे सपने तो दिल ने किए वादे ,

जब टूट गई सारी कश्मे वादे ,

तो इसी दिल ने रोना सिखाया था ,

छूप छूप कर रोया करता था ,

ये दिल जब अकेला हुआ करता था ,

पर उस रोने में भी आखिर ,

आंशु तो आँखों ने ही बहाया था .

4 टिप्‍पणियां:

Sonal Rastogi ने कहा…

सारा कसूर आँखों का ही है
"गुनाह ये करती है दिल बदनाम होता है "

अरुणेश मिश्र ने कहा…

आँख हैं या नींद की
दो गोलियाँ ।
दृष्टि मिलते ही
सुला देते हैं लोग ।

शिकवा किस बात का . यह तो होना ही था ।
रचना प्रशंसनीय ।

संजय भास्कर ने कहा…

हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

संजय भास्कर ने कहा…

सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।