रविवार, 9 मई 2010

लक्ष्य से पहले नहीं विश्राम लूँगा. ...राजीव नंदन

राजीव नंदन की रचना साभार---



सुन लीजिए कान खोल के !!
काम आ सकती है !!

मैं लडूंगा मैं लडूंगा,
जीत जाऊं या मैं जाऊं हार लेकिन मैं लडूंगा.

कफ़न आलस का कभी ओढूं नहीं,
कार्य करना है अभी सोचूँ यही,
बैठे रहने से नहीं बनते किले,
युद्धरत हूँ विजय जबतक ना मिले,

है यही प्रण नियमों का पालन करूँगा.
जीत जाऊं या मैं जाऊं हार लेकिन मैं लडूंगा.

कंटकों से हो सुसज्जित मार्ग मेरा,
हों खड़े पर्वत भी इसमें डाले डेरा,
विद्युतों का कवच पहने हो गगन,
चाहे रोके ज्वलित अग्नि का दहन,

भस्म कर दूंगा उन्हें गर मैं उठूंगा.
जीत जाऊं या मैं जाऊं हार लेकिन मैं लडूंगा.

जीत है सम्मुख नहीं मुख मोड़ना,
विजय का दामन नहीं है छोड़ना,
ये तिमिर तो बस यहीं है द्वार पर,
प्रकाश-मंजूषा मिलेगी पार कर,

तिनकों-तिनकों से महल मैं जोडूंगा.
जीत जाऊं या मैं जाऊं हार लेकिन मैं लडूंगा.

दिल पे अपने हाथ रखकर के कहूं,
मैं धरा पर रहूँ या फिर ना रहूँ,
टूट जाऊँगा मगर झुकना नहीं,
मर ही जाऊँगा मगर रुकना नहीं,

लक्ष्य से पहले नहीं विश्राम लूँगा.
जीत जाऊं या मैं जाऊं हार लेकिन मैं लडूंगा.

7 टिप्‍पणियां:

Asha ने कहा…

A nice poem with beautiful thought .
Asha

Rambabu Singh ने कहा…

लक्ष्य से पहले नहीं विश्राम लूँगा.
जीत जाऊं या मैं जाऊं हार लेकिन मैं लडूंगा.
बहूत खूब | सुन्दर और झकझोरने वाली रचना है | धन्यबाद

मेरे भाव ने कहा…

aapke drid nishchay ko darshati sunder rachna..... badhai sweekar karen ......

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत खूब बेहतरीन लिखा है आपने

Priya ने कहा…

bahut khoob! Very motivational

E-Guru Rajeev ने कहा…

चच्चा हम भी लिख ही लेते हैं. है न !!

राजीव नंदन द्विवेदी ने कहा…

भई, बहुत खूब. :)