गुरुवार, 4 मार्च 2010

बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं--------मिथिलेश दुबे

जब लगा खत्म हुई अब तलाश मंज़िल की।
धोका था नज़रों का वो इसके सिवा कुछ भी नहीं।।


समझा था क़ैद है तक़दीर मेरी मुट्ठी में;
रेत के दाने थे वे इसके सिवा कुछ भी नहीं।


मैं समझता रहा एहसास जिसे महका सा;
एक झोंका था हवा का वो और कुछ भी नहीं।


मैं समझता हूँ जिसे जान,जिगर,दिल अपना;
मुझे दिवाना वो कहते हैं और कुछ भी नहीं।


आजकल प्यार मैं अपने से बहुत करता हूँ;
होगा ये ख़्वाब और इसके सिवा कुछ भी नहीं।


लगा था रोशनी है दर ये मेरा रोशन है;
थी आग दिल में लगी इसके सिवा कुछ भी नहीं।

तेरे सिवाय जो कोई बने महबूब मेरी ;
बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं।।

3 टिप्‍पणियां:

sunita ने कहा…

wah!

कमलेश वर्मा ने कहा…

man kibat kahne ka aapka apna andaz,,uttam rchna

संजय भास्कर ने कहा…

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।