गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

जिंदगी के झंझावातों से....!!?


जिंदगी के झंझावातों से निकल जाना चाहता हूँ.
शून्य की गोद मे बिल्कुल पिघल जाना चाहता हूँ..
कुच्छ भी नही है उस शून्य के उस पार, ...
लेकर अपने अस्तित्व को बिखर जाना चाहता हूँ,,
यह जिंदगी है घूमती उस शून्य की तरह ,
पता
नही मैं किधर जाना चाहता हूँ,,
संवेदनाओं
की धृोहर जो दी है आपने ,
उनको
लेकर ना इधर ना उधर जाना चाहता हूँ!!



चित्र साभार ...राज भाटिया जी

5 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

यह जिंदगी है घूमती उस शून्य की तरह ,
पता नही मैं किधर जाना चाहता हूँ,,


इन पंक्तियों ने दिल छू लिया...... बहुत सुंदर ....रचना....

संजय भास्कर ने कहा…

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

दीर्घतमा ने कहा…

apki kabita bahut acchhi hai.

Sonal Rastogi ने कहा…

भावनाओं को बहुत सुन्दर शब्द दिए है

ओम पुरोहित'कागद' ने कहा…

राज भाटिया जी का चित्र सुंदर है।भाटिया जी को अच्छी तस्वीर उतारने के लिए बधाई!
*झनझावतोँ नहीँ
झंझावातोँ लिखिए।
omkagad.blogspot.com